MyRights

Fight For Your Rights

स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम 1986 - पूरी जानकारी हिंदी में | R.J. Sharma

स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986

The Indecent Representation of Women (Prohibition) Act, 1986

✍️ R.J. Sharma, Advocate  |  High Court & District Court  |  📅 03 March 2026  |  🏷️ Indian Law · Women Rights

📌 प्रस्तावना (Introduction)

भारत में महिलाओं की गरिमा और सम्मान की रक्षा के लिए संसद ने 1986 में स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम पारित किया, जो 2 अक्टूबर 1987 से पूरे भारत में लागू हुआ। यह कानून विज्ञापनों, फिल्मों, पत्रिकाओं, पुस्तकों और अन्य प्रकाशनों में महिलाओं के अश्लील या अपमानजनक चित्रण पर कड़ा प्रतिबंध लगाता है।

आज के डिजिटल युग में जहाँ सोशल मीडिया, OTT प्लेटफॉर्म और इंटरनेट विज्ञापन हर जगह हैं — यह कानून पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।

📖 अधिनियम की पृष्ठभूमि (Background)

1970–80 के दशक में भारतीय विज्ञापन जगत और मीडिया में महिलाओं को उत्पाद बेचने के लिए वस्तु (object) की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा था। महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के दबाव में सरकार को एक सख्त कानून बनाना पड़ा।

यह कानून भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) की भावना के अनुरूप बनाया गया है।

🔑 प्रमुख परिभाषाएँ (Key Definitions)

धारा 2(a) — विज्ञापन (Advertisement)

किसी भी माध्यम से किसी वस्तु या सेवा का प्रचार — चाहे वह टीवी हो, अखबार हो, होर्डिंग हो या डिजिटल माध्यम।

धारा 2(b) — वितरण (Distribution)

किसी सामग्री को बेचना, किराए पर देना, भेजना या किसी भी तरह से प्रसारित करना।

धारा 2(c) — अशिष्ट रूपण (Indecent Representation)

महिला के शरीर या उसके किसी अंग को इस प्रकार दर्शाना जो —

  • अश्लील (Obscene) हो
  • अपमानजनक (Derogatory) हो
  • महिलाओं को नीचा दिखाने वाला हो
  • समाज में विकृत सोच पैदा करने वाला हो

🚫 प्रतिषेध / प्रतिबंध (Prohibitions)

धारा 3 — विज्ञापनों पर प्रतिबंध

कोई भी व्यक्ति ऐसा विज्ञापन प्रकाशित, प्रदर्शित या वितरित नहीं कर सकता जिसमें महिला का अशिष्ट चित्रण हो। इसमें शामिल हैं:

  • टीवी व रेडियो विज्ञापन
  • अखबार व पत्रिका विज्ञापन
  • होर्डिंग्स और बैनर
  • डिजिटल और सोशल मीडिया विज्ञापन

धारा 4 — प्रकाशनों पर प्रतिबंध

ऐसी कोई भी पुस्तक, पर्चा, स्लाइड, फिल्म, अंकन, चित्र या आकृति जिसमें महिला का अशिष्ट चित्रण हो — उसे न बेचा जा सकता है, न किराए पर दिया जा सकता है, न ही वितरित किया जा सकता है।

✅ अपवाद (Exceptions)

यह कानून निम्नलिखित स्थितियों में लागू नहीं होता:

  • प्राचीन मंदिरों की मूर्तियाँ — धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर
  • कला और साहित्य — यदि उसका उद्देश्य लोक कल्याण हो
  • वैज्ञानिक या शैक्षणिक प्रकाशन — जो जनहित में हों
  • चिकित्सा या स्वास्थ्य संबंधी सामग्री — जो शिक्षा के उद्देश्य से हो

🔍 खोज और जब्ती (Search & Seizure — धारा 5)

  • किसी राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) को यह अधिकार है कि वह संदिग्ध परिसर में तलाशी ले।
  • ऐसी सामग्री को जब्त कर सकता है।
  • यह शक्ति मजिस्ट्रेट के वारंट के साथ या बिना भी विशेष परिस्थितियों में प्रयोग की जा सकती है।

⚖️ दंड का प्रावधान (Penalties)

अपराध कारावास जुर्माना
पहली बार 2 वर्ष तक ₹2,000 तक
दूसरी या बाद में 6 माह से 5 वर्ष ₹10,000 से ₹1,00,000

📡 आधुनिक चुनौतियाँ (Modern Challenges)

यह कानून 1986 में बना था — तब इंटरनेट और सोशल मीडिया का अस्तित्व नहीं था। आज की प्रमुख चुनौतियाँ:

  • सोशल मीडिया — Instagram, YouTube Reels पर अशिष्ट विज्ञापन सामग्री
  • OTT प्लेटफॉर्म — नियामक नियंत्रण की कमी
  • Deepfake तकनीक — महिलाओं की नकली अश्लील सामग्री बनाना
  • मोबाइल ऐप विज्ञापन — बिना किसी जाँच के चलने वाले विज्ञापन
  • विदेशी वेबसाइटें — जो भारतीय कानून की पहुँच से बाहर हों

🔄 संशोधन प्रस्ताव (Proposed Amendments)

  • इंटरनेट और सोशल मीडिया को इसके दायरे में लाना
  • दंड राशि बढ़ाना (1986 की राशि आज बहुत कम है)
  • Deepfake और AI-generated content को शामिल करना
  • शिकायत तंत्र को ऑनलाइन और सरल बनाना

🏛️ संबंधित कानून (Related Laws)

  • IT Act 2000 (धारा 67A) — इंटरनेट पर अश्लील सामग्री पर रोक
  • IPC धारा 354C — Voyeurism
  • POCSO Act — बच्चों की सुरक्षा
  • CSAM कानून — बाल यौन शोषण सामग्री पर प्रतिबंध

📝 निष्कर्ष (Conclusion)

स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986 महिला सम्मान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। लेकिन डिजिटल क्रांति के इस दौर में इसे अद्यतन (update) किए जाने की सख्त जरूरत है। कानून तब ही प्रभावी होता है जब उसका क्रियान्वयन मजबूत हो, जागरूकता हो, और दंड इतना सख्त हो कि कोई उल्लंघन करने की हिम्मत न करे।

महिला की गरिमा — कोई उत्पाद नहीं, अधिकार है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. यह अधिनियम किस पर लागू होता है?

यह अधिनियम सभी व्यक्तियों, कंपनियों, विज्ञापन एजेंसियों, प्रकाशकों और मीडिया संस्थानों पर लागू होता है जो किसी भी माध्यम से महिला का अशिष्ट चित्रण करते हैं या ऐसी सामग्री का वितरण करते हैं।

Q2. अशिष्ट चित्रण की शिकायत कहाँ करें?

पीड़ित व्यक्ति नजदीकी पुलिस थाने में FIR दर्ज करा सकता है, या राज्य महिला आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) अथवा संबंधित जिले के मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर सकता है।

Q3. क्या सोशल मीडिया पर किया गया अशिष्ट चित्रण भी इस कानून के अंतर्गत आता है?

मूल अधिनियम में सोशल मीडिया का उल्लेख नहीं है, परंतु IT Act 2000 की धारा 67 और 67A के अंतर्गत ऑनलाइन अश्लील सामग्री पर कार्यवाही की जा सकती है।

Q4. क्या विज्ञापनकर्ता और प्रकाशक दोनों दोषी माने जाएँगे?

हाँ। यह अधिनियम विज्ञापन देने वाले (advertiser), उसे प्रकाशित करने वाले (publisher) और वितरित करने वाले (distributor) — तीनों को समान रूप से उत्तरदायी ठहरा सकता है।

Q5. क्या कोई विदेशी कंपनी भी इस कानून के दायरे में आती है?

यदि विदेशी कंपनी का विज्ञापन भारत में प्रसारित होता है और उसमें महिला का अशिष्ट चित्रण है, तो उस पर भारतीय कानून लागू हो सकता है। हालाँकि व्यावहारिक प्रवर्तन में अभी भी कठिनाइयाँ हैं।

Q6. क्या फिल्मों में भी यह कानून लागू होता है?

हाँ। फिल्मों में महिला का अशिष्ट चित्रण इस अधिनियम की धारा 4 के अंतर्गत प्रतिबंधित है। इसके अतिरिक्त Cinematograph Act और CBFC (सेंसर बोर्ड) के दिशानिर्देश भी लागू होते हैं।

Q7. क्या इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध जमानती है?

पहली बार के अपराध के लिए यह जमानती हो सकता है, जबकि बार-बार किए गए अपराध की स्थिति में न्यायालय जमानत देने से इनकार भी कर सकता है।

Q8. कला और अश्लीलता के बीच सीमा रेखा कैसे तय होती है?

न्यायालय इसका निर्धारण "औसत व्यक्ति की सोच" और "समग्र सामाजिक प्रभाव" के आधार पर करता है। यदि सामग्री महिला की गरिमा का उल्लंघन करती है और उसका कोई सामाजिक उद्देश्य नहीं है, तो वह दंडनीय हो सकती है।

Q9. क्या पीड़ित महिला स्वयं शिकायत दर्ज कर सकती है?

हाँ। कोई भी महिला या उसकी ओर से कोई भी व्यक्ति शिकायत दर्ज कर सकता है। इसके अतिरिक्त महिला आयोग, NGO या कोई भी नागरिक स्वतः संज्ञान के आधार पर भी शिकायत कर सकता है।

Q10. इस कानून की सबसे बड़ी कमज़ोरी क्या है?

इस अधिनियम की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि यह डिजिटल और इंटरनेट माध्यमों को स्पष्ट रूप से कवर नहीं करता, जुर्माने की राशि बहुत कम है, और प्रवर्तन तंत्र अत्यंत कमज़ोर है।

R

R.J. Sharma, Advocate

High Court & District Court