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आर.जे. शर्मा, एडवोकेट

NRI लीगल स्पेशलिस्ट • वैवाहिक विवाद • आपराधिक मुकदमे

व्हाट्सएप परामर्श

हर किसी के लिए सरल कानूनी पहुंच

भारतीय कानूनी प्रणाली के माध्यम से नेविगेट करना एक अंतहीन भूलभुलैया में चलने जैसा महसूस हो सकता है। MyRights में, आर.जे. शर्मा, एडवोकेट की विशेषज्ञता के नेतृत्व में, हम जटिल प्रक्रियाओं और डराने वाली कानूनी शब्दावली की बाधाओं को तोड़ने के लिए समर्पित हैं। हमारा मानना है कि सच्चा न्याय समझ से शुरू होता है। हमारा प्लेटफॉर्म, www.myrights.in, अदालत और आम नागरिक के बीच एक डिजिटल सेतु के रूप में कार्य करता है।

"हमारा मिशन यह सुनिश्चित करना है कि कानूनी ज्ञान केवल वकीलों के लिए आरक्षित विशेषाधिकार न हो, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए एक हथियार हो जो अपने अधिकारों के लिए लड़ने को तैयार है।"

पेशेवर वकालत (Professional Advocacy)

आर.जे. शर्मा, एडवोकेट के रूप में, मैं भारतीय न्यायपालिका के सभी स्तरों पर व्यापक कानूनी प्रतिनिधित्व प्रदान करता हूँ। हमारी प्रैक्टिस जिला एवं सत्र न्यायालयों से लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ बेंच सहित), और संवैधानिक व्याख्याओं के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक फैली हुई है।

हम भारतीय न्याय संहिता (BNS) और BNSS के नए कानूनी प्रावधानों को संभालने में विशेषज्ञ हैं। हमारी फर्म 'डिस्टेंस एडवोकेसी' (Distance Advocacy) के लिए विशिष्ट रूप से सुसज्जित है, जो डिजिटल परामर्श, इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग और पारदर्शी वर्चुअल रिपोर्टिंग के माध्यम से NRIs और दूरदराज के ग्राहकों को निर्बाध कानूनी सहायता प्रदान करती है।

झूठे मुकदमों के खिलाफ योद्धा

आधुनिक कानूनी परिदृश्य में, धारा 498A (BNS 85), घरेलू हिंसा अधिनियम और झूठे उत्पीड़न के दावों जैसे कानूनों का दुरुपयोग निर्दोष पुरुषों और उनके परिवारों के लिए एक गंभीर चुनौती बन गया है। हम दुर्भावनापूर्ण कानूनी जाल में फंसे लोगों के लिए एक ढाल के रूप में खड़े हैं।

हमारा 'पुरुष अधिकार' (Men's Rights) अभियान निम्न पर केंद्रित है:

  • झूठी FIR को रद्द कराना (Sec 482 CrPC / Sec 528 BNSS)
  • वैवाहिक क्रूरता के मामलों में रणनीतिक बचाव
  • परिवारों को अवैध गिरफ्तारी और पुलिस उत्पीड़न से बचाना
  • सामाजिक और कानूनी सम्मान बहाल करने की लड़ाई

भारतीय अदालती कार्यप्रणाली

  1. FIR/शिकायत: पुलिस स्टेशन में FIR या मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत।
  2. जांच: पुलिस द्वारा साक्ष्य एकत्र करना और गवाहों के बयान।
  3. चार्जशीट: अदालत में पुलिस की अंतिम रिपोर्ट।
  4. आरोप तय करना (Framing of Charges): न्यायाधीश द्वारा आरोपों का मूल्यांकन।
  5. साक्ष्य (Evidence): अभियोजन और बचाव पक्ष की जिरह।
  6. फैसला: अंतिम बहस के बाद निर्णय।
  1. वाद (Plaint): वादी द्वारा लिखित शिकायत।
  2. समन (Summons): प्रतिवादी को अदालत का नोटिस।
  3. लिखित बयान (Written Statement): प्रतिवादी का उत्तर।
  4. मुद्दे तय करना (Issues): विवाद के मुख्य बिंदुओं की पहचान।
  5. ट्रायल: दस्तावेजों और गवाहों की प्रस्तुति।
  6. डिक्री: अदालत का अंतिम समाधान।

कानूनी प्रश्नोत्तरी (Complete FAQ)

प्रश्न: IPC और BNS (भारतीय न्याय संहिता) में क्या अंतर है?

उत्तर: BNS ने ब्रिटिश कालीन IPC की जगह ली है। इसमें धाराओं को पुनर्गठित किया गया है और डिजिटल साक्ष्यों एवं नए अपराधों (जैसे संगठित अपराध) पर विशेष जोर दिया गया है।

प्रश्न: ज़ीरो FIR (Zero FIR) क्या होती है?

उत्तर: जब अपराध किसी ऐसे क्षेत्र में होता है जो उस पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, तब भी पुलिस को FIR दर्ज करनी पड़ती है। इसे बाद में संबंधित थाने में ट्रांसफर कर दिया जाता है।

प्रश्न: क्या पुलिस रिमांड को चुनौती दी जा सकती है?

उत्तर: हाँ, रिमांड के आधारों को अवैध मानकर या मानवाधिकारों के उल्लंघन के आधार पर सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

प्रश्न: झूठी 498A (BNS 85) FIR से परिवार को कैसे बचाएं?

उत्तर: सबसे पहले उच्च न्यायालय से गिरफ्तारी पर रोक या अग्रिम जमानत लें। यदि आरोप पूरी तरह निराधार हैं, तो साक्ष्यों के साथ 'क्वैशिंग' (Quashing) याचिका दायर करें।

प्रश्न: क्या पति भी भरण-पोषण (Maintenance) मांग सकता है?

उत्तर: हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 और 25 के तहत, यदि पति शारीरिक या मानसिक रूप से कमाने में असमर्थ है और पत्नी कमा रही है, तो वह भरण-पोषण का दावा कर सकता है।

प्रश्न: चाइल्ड कस्टडी के मामले में अदालत क्या देखती है?

उत्तर: अदालत का प्राथमिक विचार "बच्चे का कल्याण" (Welfare of Child) होता है। इसमें माता-पिता की वित्तीय स्थिति से ज्यादा उनके नैतिक चरित्र और बच्चे के साथ जुड़ाव को देखा जाता है।

प्रश्न: क्या मुझे भारत आए बिना तलाक मिल सकता है?

उत्तर: हाँ, आपसी सहमति के मामलों में पावर ऑफ अटॉर्नी और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से गवाही दर्ज कराकर प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।

प्रश्न: NRI अपनी भारत स्थित संपत्ति को अवैध कब्जे से कैसे बचाएं?

उत्तर: रेंट एग्रीमेंट का समय पर रिन्यूअल, म्यूटेशन रिकॉर्ड की नियमित जांच और स्थानीय अटॉर्नी के माध्यम से 'पजेशन सूट' (Possession Suit) दाखिल करना प्रभावी उपाय हैं।

प्रश्न: वसीयत (Will) को रजिस्टर कराना क्यों जरूरी है?

उत्तर: हालांकि अनिवार्य नहीं है, लेकिन रजिस्टर्ड वसीयत की कानूनी प्रमाणिकता ज्यादा होती है और इसे अदालत में चुनौती देना कठिन होता है।

प्रश्न: 'स्टे ऑर्डर' (Stay Order) कैसे प्राप्त करें?

उत्तर: अपूरणीय क्षति की संभावना होने पर, अंतरिम राहत के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 नियम 1 और 2 के तहत आवेदन किया जाता है।

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